आधी आबादी के लिए ईमानदार पहल जरूरी

आधी आबादी
आधी आबादी

देश में बढ़ते लिंगानुपात की समस्या चरम पर पहुँच चुकी है। कई राज्यों में तो लड़कियों का अनुपात बेहद चिंताजनक एवं बदतर स्थिति में पहुँच चुका है। देश में बेटियों की संख्या बेटों के बराबर लाने के लिए ठोस पहल करने की सख्त आवश्यकता है। आम तौर पर कन्या-भू्रण हत्या के लिए दो मुख्य कारकों को ही उत्तरदायी माना या समझा जाता रहा है। इसमें पहला मुख्य कारक लोगों की यह मानसिकता है कि ‘सिर्फ लड़के से ही वंश चलता है’ और दूसरा यह कि ‘लड़कियाँ पराया धन होती हैं।’ इन दो मुख्य कारकों के अलावा भी अन्य कई कारक हैं, जो बेटियों को कोख में ही कत्ल करवाने के लिए उत्तरदायी हैं।

उन कारकों पर भी गम्भीर विचार-मन्थन करना बेहद अनिवार्य है। अन्य कारकों पर चर्चा से पहले इस यक्ष प्रश्न का जवाब दिया जाना चाहिए कि क्या इन दो मुख्य कारकों का समाधान ढ़ूंढ़ा जा चुका है? क्या समाज में व्याप्त दोनों मानसिकताओं से छुटकारा पाने के लिए कारगर उपाय ढ़ूंढ़ लिए गए हैं? विडम्बना का विषय है कि इसका जवाब नहीं है।

यदि ऐसा है तो कहने की आवश्यकता नहीं है कि देश व समाज के लिए ‘नासूर’ बन चुकी ‘कन्या भू्रण हत्या’ की समस्या टस से मस होने वाली नहीं है और यह महाभियान औपचारिकताओं के आगोश में समा जाने वाला है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब तक लोगों की मानसिकता में बदलाव नहीं आयेगा, तब तक इस सामाजिक अभिशाप से छुटकारा नहीं पाया जा सकता। लेकिन, यह बदलाव आयेगा कैसे? एक लंबे अरसे से ‘कन्या भू्रण हत्या’ के खिलाफ मुहिम चल रही है। ‘जागरूकता कार्यक्रमों’ के नाम पर भारी-भरकम धनराशि स्वाहा हो चुकी है।

इसके बावजूद, समस्या कम होने की बजाय, निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। ऐसा क्यों? इस यक्ष प्रश्न का जवाब ढूंढ़ा जाना बेहद जरूरी है। निरूसन्देह, इसके लिए अब तक ईमानदार प्रयास नहीं हुए हैं। यदि ‘लोगों की मानसिकता को कैसे बदला जाए’ से पहले ‘लोगों की ऐसी मानसिकता क्यों है’ के सवाल पर जोर दिया जाए तो संभवतः समस्या का सहज निवारण हो सकता है। ‘सिर्फ लड़कों से ही वंश चलता है’ की मानसिकता का मुख्य कारण ‘पुरूष-प्रधानता की सोच’ है। सदियों से पुरूष-सत्ता चलती आ रही है। पुरूष प्रधान समाज ने नारी वर्ग को एकदम गौण, पुरूष-आश्रित और निर्बल बनाकर हाशिए पर डाला हुआ है।

जब तक इस परिपाटी में बदलाव नहीं आयेगा और जब तक ‘पुरूष सत्ता’ को ध्वस्त करके ‘पुरूष-महिला’ की समानुपाती सामाजिक व्यवस्था का निर्माण नहीं किया जायेगा, तब तक समाज से ‘वंशवाद’ की मानसिकता समाप्त करने की उम्मीद रखना, एकदम बेमानी होगा। महिला एवं पुरूष को हर क्षेत्र में बराबर का हक मिलेगा, तभी समाज से लड़की के प्रति ‘पराया धन’ की मानसिकता का खात्मा संभव हो पायेगा। निश्चय ही यह आमूल-चूल परिवर्तन एक झटके में संभव नहीं है, लेकिन इसके लिए एक ईमानदार पहल तो करनी ही होगी।

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