प्राकृतिक आपदा पर लेख

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एलायंस टुडे ब्यूरो

लेख । भारत में प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा, चक्रवात और भूकंप आदि से व्यापक क्षति होती रही है। आपदा प्रबंधन बहुआयामी, बहु-अनुशासनात्मक और क्षेत्रीय दृष्टिकोण, जिसमें इंजीनियरिंग, सामाजिक और वित्तीय आदि सभी प्रक्रियाओं का समावेश हो, को अपनाने की आवश्यकता पर जोर देता है। दुर्भाग्य से भारत का आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर अच्छा रिकॉर्ड नहीं रहा है।

प्राकृतिक आपदाओं को होने से तो रोका नहीं जा सकता क्योंकि वे उसी प्राकृतिक वातावरण का हिस्सा है जिसमें हम रहते हैं, लेकिन जहां तक संभव हो सके हम लोगों एवं उनकी संपत्तियों पर पड़ने वाले इन प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए समाज के विभिन्न स्तरों पर एहतियाती कदम उठा सकते हैं। यहाँ हम आपको विभिन्न शब्द सीमाओं जैसे कि 300, 500, 600 और 800 शब्दों के लेख प्रदान कर रहे हैं जिनमें से आप अपनी आवश्यकतानुसार किसी भी लेख का चयन कर सकते हैं।

पर्यावरण को लगातार क्षति पहुंचने की वजह से पूरी दुनिया प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त है और इसलिए हमें तत्काल इनसे बचाव के तरीकों पर अपना ध्यान केन्द्रित करना होगा। भारत और अन्य देश पूरी दुनिया में हो रहे पर्यावरण असंतुलन का मूल्य चुकाने को मजबूर हैं और इन देशों में प्राकृतिक आपदाओं की वजह से जीवन और संपत्ति की व्यापक हानि हो रही है।

भारत में प्राकृतिक आपदाओं के अभी हाल के उदाहरण

  • 2005 में भारत की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई में आई बाढ़ ने पूरे शहर को अस्त-व्यस्त कर दिया।
  • 2008 में बिहार के सैकड़ों गांवों में कोसी नदी का सैलाब आया जिसमें गांव के गांव जलमग्न हो गए।
  • अगस्त 2010 में जम्मू-कश्मीर के लेह में बादल फटने के कारण लगभग 113 लोग मारे गए।
  • 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी की वजह से 9.3-परिमाण का भूकंप आया था।
  • 2013 में उत्तराखंड में बादल फटने की वजह से जबरदस्त तबाही मची थी और हजारों लोगों की मौत हो गई थी।

आपदाओं के मानव निर्मित कारण

विकास और शहरीकरण के नाम पर अंधाधुंध परियोजनाएं चल रही हैं और इन सब से पर्यावरण को अकल्पनीय क्षति पहुंच रही है। बिजली, पानी, पर्यटन और विकास के नाम पर पहाड़ियां क्षतिग्रस्त की जा रही हैं और पठारों में वन समाप्त हो रहे हैं। खनिजों के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन हो रहा है और मैदानी इलाकों में बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं।

भारत में आपदा प्रबंधन

देश में आपदाओं से निपटने एवं उन्हें कम करने के लिए तथा एक वंचित संस्थागत तंत्र के तहत पीड़ितों के पुनर्वास के लिए संसद द्वारा आपदा प्रबंधन विधेयक 28 नवम्बर, 2005 को अनुमोदित किया गया था। इस विधेयक को 23 दिसम्बर, 2005 में अधिनियमित किया गया था। इसके तहत प्रधानमंत्री के नेतृत्व में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तथा मुख्यमंत्रियों के नेतृत्व में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एवं जिला न्यायाधीशों की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के स्थापना का प्रावधान है। इसमें संबंधित मंत्रालयों और विभागों द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना तैयार करने का भी प्रावधान है। साथ ही, इसमें आपातकालीन कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल बनाने का तथा प्रशिक्षण और क्षमता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान बनाने का भी प्रस्ताव है। इस अधिनियम में एक राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष और राष्ट्रीय आपदा शमन निधि तथा राज्य और जिला स्तरों पर भी समान कोषों के गठन का प्रावधान है।

निष्कर्ष

सरकार द्वारा इन सभी उपायों के बावजूद, प्रभावी आपदा प्रबंधन के लिए जागरूकता पहली शर्त है जिससे राहत पहुंचाने वाली एजेंसियों को प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल उपयोग में लाया जा सके। अगर लोगों में आपदा के प्रति जागरूकता नहीं है तो भयानक विनाश राहत पहुंचाने के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। आपदा क्षेत्रों में लोगों को बचाव के लिए जरूरी बुनियादी जानकारी देकर जहां तक संभव हो सके आपदाओं की वजह से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। समुचित संचार-व्यवस्था, ईमानदार और प्रभावी नेतृत्व, नियोजन एवं समन्वय, आदि आपदा प्रबंधन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

 

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