तो सही साबित हुई अंबेडकर की आशंका!

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रमेश चन्द्र

संविधान निर्माता व दलितों के मसीहा बाबा साहब भीम राव अंबेडकर की आशंका सही साबित हुई। देश के ज्यादातर दलित नेता राजनीतिक दलों के ‘दलाल’ बन कर रह गये हैं। वर्तमान में समाज में यह चर्चा आम हो गई है। ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं है जो अंबेडकर के जातिविहीन समाज के सपने को साकार करने के लिए आगे आये। केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा ने मुस्लिमों की तीन तलाक जैसी कुप्रथा पर तो गंभीरता दिखाई, पर सनातन धर्म की जाति कुप्रथा पर मौन साधे हुए है।
वर्तमान में बाबा साहब अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता बढ़ती ही जा रही है। दलितों तथा गैर दलितों के बीच उनकी तरह-तरह से व्याख्या की जा रही है। अंबेडकर के विचारों के तीन प्रमुख स्रोत थे। पहला उनका अपना अनुभव, दूसरा-महात्मा ज्योतिबा फूले का सामाजिक आंदोलन तथा तीसरा-बुद्धिज्म। इन स्रोतों की जड़ में भारत की अमानवीय जाति व्यवस्था थी। डॉ. अबेडकर को भी छुआछूत और जातीय घृणा का शिकार होना पड़ा था, जिससे खिन्न होकर उन्होंने इसे खत्म करने का अभियान चलाया था। उन्होंने जाति व्यवस्था की कथित ईश्वरीय अवधारणा का तीखा विरोध किया और इसे मानव निर्मित बताया था।
जाति की अवधारणा के चलते डॉ. अंबेडकर ने जाति व्यवस्था को हिंदू धर्म की प्राण वायु बताया और साफ शब्दों में कहा कि ऊंच-नीच के भेदभाव के चलते हिंदू धर्म कभी मिशनरी धर्म नहीं बन पाया, जबकि अन्य धर्म जैसे बौद्ध धर्म अनेक देशों की सीमाएं पार कर गए। जाति व्यवस्था विरोधी, अहिंसक तथा विश्वबुंधत्ववादी होने के कारण डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इन्हीं कारणों से उन्होंने बौद्ध धर्म को दलितों के लिए सबसे उचित धर्म बताया। संक्षेप में डॉ. अंबेडकर का यही सामाजिक चिंतन था। संविधान के माध्यम से उन्होंने भारतीय जनतंत्र को विकासशील बनाया, जिस कारण देश की एकता मजबूत हुई।
डॉ. अंबेडकर का राजनीतिक चिंतन भी जाति व्यवस्था से उत्पन्न परिस्थितियों से प्रभावित हुआ था। वह 1920 के दशक से ही दलितों के लिए पृथक मतदान की मांग करने लगे थे। इसके पीछे उनका तर्क था कि ऐसा होने से जाति व्यवस्था के विरोध तथा दलितों के हित में काम करने वाले ही चुनकर विधानसभा तथा लोकसभा में पहुंच सकेंगे अन्यथा दलित स्थापित पार्टियों के दलाल बनकर रह जाएंगे। गांधीजी के प्रबल विरोध और आमरण अनशन के कारण पृथक मतदान की मांग वापस ले ली गई, जिसके बदले मौजूदा आरक्षण व्यवस्था लागू हुई। यह व्यवस्था पूना पैक्ट के नाम से जानी जाती है। पूना पैक्ट का सबसे अधिक प्रभाव शिक्षा के क्षेत्र में पड़ा। लाखों की संख्या में दलित शिक्षित होकर हर श्रेणी की नौकरियों में शामिल हुए और उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा बदल दी। लेकिन आरक्षण नीति सही ढंग से लागू न होने के कारण दलित समाज का नुकसान भी हुआ है। डॉ. अंबेडकर की आशंका सही सिद्ध हुई। विधानसभा तथा लोकसभा में चुने हुए प्रतिनिधि दलित मुक्ति के सवाल पर नकारात्मक भूमिका में आ गए।

सालों-साल चलती रही इसी भूमिका के कारण कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी का 1984 में उदय हुआ। कांशीराम ने उस समय की जनतांत्रिक प्रणाली में दलितों की भूमिका को ‘चमचा युग’ बताया था। इसलिए उन्होंने बसपा का जो वैचारिक आधार खड़ा किया वह डॉ. अंबेडकर की आरंभिक राजनीतिक समझ यानी 1920 तथा 30 के दशक के विचारों पर आधारित है। यही कारण है कि उनके क्रियाकलाप में राजनीतिक तीखापान अधिक झलकता था। डॉ. अंबेडकर 1920 तथा 30 के दशक में जाति व्यवस्था के विरुद्ध उग्र रूप धारण किए हुए थे। बाद में उन्होंने सत्ता में भागीदारी के माध्यम से दलित मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने की कोशिश की। कांशीराम ने सत्ता में भागीदारी को सत्ता पर कब्जा में बदल दिया। इस उद्देश्य से उन्होंने नारा दिया अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो। इस नारे के तहत सर्वप्रथम बसपा ने विभिन्न दलित जातियों का सम्मेलन करके उन्हें अपनी तरफ आकर्षित किया। साथ ही उसने पिछड़ी जातियों को अपनी तरफ लाने की कोशिश की जिसका परिणाम था बसपा का 1993 में समाजवादी पार्टी से समझौता। दो साल बाद इस गठबंधन के टूट जाने के बाद बसपा का झुकाव भारतीय जनता पार्टी की तरफ बढ़ा तथा उसके सहयोग से मायावती तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। पर 2007 में उत्तर प्रदेश के आम चुनाव में मायावती के नेतृत्व में बसपा ने दलित-ब्राह्मण एकता के नारे के साथ बहुमत हासिल कर लिया। यह बहुमत प्रचंड जातीय धु्रवीकरण के आधार पर मिला था। वैसे भी भारतीय चुनाव प्रणाली में हमेशा जातीय, क्षेत्रीय और सांप्रदायिक धु्रवीकरण आम प्रक्रिया का हिस्सा रही है। पर मंडल कमीशन के लागू होने के बाद जातीय धु्रवीकरण बेहद उग्र रूप में जनता के समक्ष आया। उत्तर प्रदेश में इस धु्रवीकरण से बसपा को सबसे अधिक फायदा पहुंचा है, जिस कारण वह सत्ताधारी पार्टी बन गई।
सवाल यह उठता है कि जातीय ध्रुवीकरण के आधार पर चुनाव जीत कर सत्ताधारी तो बना जा सकता है, पर डॉ. अंबेडकर की जाति-उन्मूलन की विचारधारा को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता। बुद्ध से लेकर अंबेडकर तक ने जाति-विहीन समाज में ही दलित मुक्ति की कल्पना की थी, पर आज का भारतीय जनतंत्र पूरी तरह जातीय, क्षेत्रीय व सांप्रदायिक जनतंत्र में बदल चुका है। वर्ष 2014 या 2019 का लोकसभा चुनाव हो, चुनाव में राजनीतिक दलों के क्या मूल्य रहे, इससे जनता बखूबी जानती है। सत्ताधारी दल भाजपा हो या विपक्षी दल कांग्रेस, सपा व बसपा हो, इनमें चुने हुए दलित प्रतिनिधियों व नेताओं की भूमिका जगजाहिर है। अंबेडकर की जाति विहीन समाज के सपने पर ये नेता कुछ बोलने को तैयार नहीं हैंै। सामान्य वर्ग के लोग बातचीत में तो यह स्वीकार करते हैं कि वर्ण व जाति व्यवस्था मानव निर्मित है। यह जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि कर्म पर आधारित है, फिर पर सभी वर्गों के लोग कथित वर्णों-जातियों पर कब्जा जमाये हुए हैं, इसी से उनकी राजनीति चल रही है, इससे उनका स्वार्थ सिद्ध हो रहा है। ऐसा जनतंत्र राष्ट्रीय एकता के लिए वास्तविक खतरा है। डॉ. अंबेडकर की जातिविहीन समाज की स्थापना के बिना स्वराज प्राप्ति का कोई महत्व नहीं है।

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