सामाजिक सद्भाव बनाने में यहां हनुमान मंदिरों की है अहम भूमिका,जानिए वजह

कूसे ब्रहमन ने सदा दी अज़ान की…मस्जिद से हमने सजदा किया सोमनाथ का।  नवाब वाजिद अली शाह के इस शेर में घुली भाईचारे की सोंधी महक आज भी शहर की मिट्टी में बची हुई है।
इतिहासकार योगेश प्रवीन बताते हैं कि नवाबों ने उस दौर में हनुमान जी के मंदिरों के निर्माण में योगदान देकर राजधानी लखनऊ में बड़े मंगल की शुरुआत की। अलीगंज के प्राचीन हनुमान मंदिर की नींव राजपूत घराने की छतर कुंवरि ने डाली। फैजाबाद के नवाब सुजाउदौला से ब्याही छतर कुंवरि बचपन से हनुमान भक्त थीं। एक बार उनका बेटा नवाब सआदत अली खां बीमार हो गया। उन्होंने मन्नत मांगी कि हनुमान जी की कृपा से बेटे के ठीक होने पर वे हनुमान मंदिर का निर्माण कराएंगी। बेटे के ठीक होने पर उन्होंने साल 1799 में मंदिर बनवाना शुरू किया जो 1800 में बनकर तैयार हो गया। तब से आज तक प्राचीन हनुमान मंदिर उनके नाम से ही मशहूर है।

…बाढ़ में भी बच गई मूर्ति
1960 की बाढ़ में बाबा नीम करौरी आश्रम भी तबाही की चपेट में आ गया था। यहां बजरंगबली की मूर्ति छोड़कर सबकुछ नष्ट हो गया। नीम करौरी बाबा ने दोबारा मंदिर बनवाया। उन्होंने मूर्ति का मुख सड़क की ओर कराया, ताकि भक्तों को दर्शन में सुविधा हो।

100 साल पुराना है दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर 
चौपटिया के दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर का निर्माण सौ साल पहले हुआ था। यहां के स्थानीय निवासी सुशांत गुप्ता ने बताया कि इस मंदिर में दूर से लोग अपनी अर्जियों को लेकर आते हैं। यहां विशेष रूप से बड़े मंगल पर बाबा का शृंगार किया जाता है। यहां भक्त जो भी मनौती मांगते हैं, पूरी होती है।

अलीगंज का नया हनुमान मंदिर जाटमल ने बनवाया 
अलीगंज के नए हनुमान मंदिर में स्थापित हनुमान जी की मूर्ति इत्र के व्यापारी जाटमल को तालाब से मिली थी। पेड़ के नीचे मूर्ति रखकर उन्होंने पूजा शुरू कर दी। नवाब वाजिद अली शाह उधर से गुजरे तो पूछा कि यह मूर्ति मंदिर में क्यूं नहीं है। जाटमल ने कहा कि मेरा इत्र और केसर बिक जाए तो मन्दिर बनवा दूंगा। इसके बाद नवाब ने उनका सारा माल खरीद लिया। सन् 1852 में इस मंदिर की स्थापना हुई।

कुएं से निकली थी हनुमान जी की मूर्ति 
मेडिकल कालेज चौराहा के पास स्थित छांछी कुआ हनुमान मन्दिर में 1884 के आसपास एक बारात इस मन्दिर में रुकी थी बारातियों के जलपान के लिए जब महंत के शिष्य ने कुएं में बाल्टी डाली तो पानी की जगह छांछ निकली। जिसके बाद से इस मन्दिर का नाम छांछी कुआ पड़ गया। इसी कुएं से एक बजरंगबली की प्रतिमा भी निकली थी। मन्दिर की स्थापना महंत बाबा परमेश्वर दास ने कराई थी।

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