श्रम अदालत के हस्तक्षेप से इन्टीग्रल यूनिवर्सिटी को करना पड़ा ग्रेच्युटी का भुगतान

-कर्मचारी के उत्पीड़न का मामला

एलायंस टुडे ब्यूरो

लखनऊ। निजी यूनिवर्सिटी के ग्रेच्युटी का भुगतान करने में आनाकानी करने पर श्रम अदालत ने गंभीर रुख अपनाया और यूनिवर्सिटी को अंततः भुगतान करना पड़ा। श्रम अदालत के इस कदम से पीड़ित कर्मचारी को राहत मिल गई है। मामला इन्टीग्रल यूनिवर्सिटी का है। ग्रेच्युटी का भुगतान न होने पर मुश्ताक विल्ला, कंकड़ कुआं, बिजनौर निवासी आफ़ाक़ महमूद ने वर्ष 2014 में श्रम अदालत में वाद दर्ज कराया और यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर वसीम अख्तर व रजिस्ट्रार डाण् इरफान अली खान को प्रतिवादी बनाया। बहस के दौरान यह तथ्य पाये गये कि वादी आफ़ाक़ महमूद यूनिवर्सिटी में कार्यरत थे। वादी की नियुक्ति 11 फरवरी 2002 को यूनिवर्सिटी में हुई थी और 26 जून 2014 को उनकी सेवा समाप्त कर दी गई। वादी ने निर्धारित ग्रेच्युटी चार लाख 25 हजार 548 के भुगतान की मांग की, पर यूनिवर्सिटी ने उसे देने से साफ इनकार कर दिया।
अदालत ने पाया कि नौकरी के दौरान वादी को कोई चार्जशीट नहीं दी गई, बल्कि नो ड्यूज सर्टिफिकेट जारी किया गया, जबकि यूनिवर्सिटी ने वादी पर 9 लाख रुपये का फर्जीवाड़ा करने का आरोप लगाते हुए गबन का मुकदमा दायर कर दिया था। यूनिवर्सिटी का कहना था कि वादी को ग्रेच्युटी का कोई अधिकार नहीं है। अदालत ने यूनिवर्सिटी द्वारा लगाये गये गबन के आरोपों की जांच कराई, पर कोई साक्ष्य नहीं मिले। अदालत ने पाया कि वादी के खिलाफ पेशबंदी की कार्रवाई की जाती रही। अदालत ने कहा कि वादी ग्रेच्युटी पाने का अधिकारी है। इस पर अदालत ने ग्रेच्युटी के शीघ्र भुगतान के आदेश जारी कर दिये। इस मामले में अदालत ने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर व रजिस्ट्रार को आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। श्रम अदालत के कड़े रुख के कारण यूनिवर्सिटी को ग्रेच्युटी का भुगतान करना पड़ा।

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