मनोवैज्ञानिक युद्ध के महारथी चीन का कोई दबाव काम नहीं आया

भारत-चीन सीमा विवाद का केन्द्र बिंदु रहे “डोकलाम” मामले का सोमवार को अंत हो गया। डोकलाम मामले को लेकर चीन पर चौतरफा वैश्विक दबाव था। पिछले दो माह से चल रहे डोकलाम विवाद को सुलझाते हुए भारत और चीन की सेना ने डोकलाम से पीछे हटने का फैसला लिया है। सोमवार को विदेश मंत्रालय की ओर से से बयान में कहा गया है कि दोनों देशों ने इस मुद्दे पर लगातार बात की है, जिसके बाद इस पर फैसला लिया गया है। इसमें कहा गया है कि विवाद के बाद भी पिछले कई दिनों से दोनों देशों के बीच इस मुद्दे को सुलझाने पर बातचीत चल रही थी। दोनों देशों की सेना अब धीरे-धीरे अपनी सेना हटाएंगी।” खैर, अब दोनों देश अपनी सेनाएँ हटा चुके हैं।

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने कहा, “मैं इस बात की पुष्टि करती हूँ कि भारतीय सेना के जवान अपने क्षेत्र में जाने के लिए तैयार हो गए हैं।” परंतु चीनी सेना की वस्तुस्थिति पर चुप्पी साध ली। साथ ही चीन ने कहा कि वह सीमा पर पेट्रोलिंग करता रहेगा। भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों के सैनिक नॉन कॉम्बैटिव मोड में पेट्रोलिंग करते रहते हैं। चीनी सैनिक पहले भी वहाँ पेट्रोलिंग करते रहे हैं, जिसे लेकर भारत को बहुत ज्यादा आपत्ति नहीं रही है।

इस तरह अगर भारत और चीन के बयानों को देखे तो इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। हाँ, चीनी बयान में संभवतः जन दबाव को देखते हुए, चीनी सैनिकों के पक्ष पर चुप्पी रखकर सुविधा अनुसार आधी जानकारी ही दी जा रही है। इस तरह डोकलाम मामले का 71 दिन के बाद कूटनीतिक समाधान निकल गया। चीन अब डोकलाम में सड़क नहीं बना सकेगा। चीनी सैनिक अपने बुलडोजर भी वापस ले गए हैं।

चीन ने 16 जून को आक्रामक विस्तारवादी नीति के माध्यम से वर्चस्व स्थापित करने के लिए रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले डोकलाम के पठार को चुना, जो भूटान का हिस्सा है और उस स्थान से दक्षिण में 40 किमी की दूरी पर सिलिगुड़ी कॉरीडोर स्थित है। इस सिलिगुड़ी कॉरीडोर को चिकेन नेक भी कहा जाता है। इस चिकेन नेक के द्वारा ही भारत पूर्वोत्तर भारत से संबद्ध है। अगर इस पर चीनी वर्चस्व कायम हो जाता तो संपूर्ण पूर्वोतर भारत पर संकट के बादल गहरा जाते। इस दृष्टि से आज डोकलाम गतिरोध के समाप्ति के महत्व को समझा जा सकता है।

मनौवैज्ञानिक युद्ध के महारथी चीन को थोड़ा भी अंदाजा नहीं था कि उसके भारत पर दबाव डालने की रणनीति पूर्णतः बेअसर रहेगी। चीन ने निश्चित रूप से यह उम्मीद नहीं की थी कि डोकलाम में भूटान के पक्ष में भारत खड़ा होगा। भूटान के भारत के साथ खास रिश्ते हैं और 1949 की संधि के मुताबिक, ये विदेशी मामले में भारत “सरकार की सलाह से निर्देशित” होगा। 1949 में हस्ताक्षर की गई संधि और फिर 2007 में दोहराई गई संधि के अनुसार, भूटान के भूभाग के मामलों को देखना भी भारत की जिम्मेदारी है। ऐसे में अगर चीन, भूटान के किसी हिस्से पर दावा ठोकता है या उसकी संप्रभुता में दखल देता है, तो भारत के लिए भी विरोध करना जरूरी है।

भारत ने चीनी अपेक्षाओं के विपरीत डोकलाम में लगातार डटे रहते हुए तथा अनावश्यक बयानबाजी से दूर रहते हुए शांतिपूर्ण ढंग से और कूटनीतिक रूप से गतिरोध को सुलझाने का परिपक्व प्रयास किया। वहीं इस संपूर्ण प्रकरण में चीन के विदेश मंत्रालय द्वारा अनियंत्रित टिप्णियाँ की गईं। जिसके फलस्वरूप घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर चीन के छवि को काफी नुकसान पहुँचा। जबकि भारतीय कूटनीति को पश्चिम सहित वैश्विक समर्थन मिला।

अब प्रश्न उठता है कि इस मामले पर लगातार अड़ियल रुख प्रकट करने वाला चीन आखिर कूटनीतिक मार्ग से समाधान के लिए क्यों तैयार हुआ? वह भी तब जब चीन भारत को लगातार धमकी दे रहा था कि भारत अपनी सेना बिना किसी शर्त के हटाए और सेना के हटने पर ही वार्ता होगी।

चीन में अगले माह 3-5 सितंबर तक ब्रिक्स सम्मेलन है। इस कारण इस सम्मेलन से पूर्व भारत और चीन के ऊपर डोकलाम दबाव को निपटाने का भारी दबाव था। ब्रिक्स का महत्वपूर्ण सदस्य रूस, जो भारत और चीन दोनों का घनिष्ठ मित्र है, ने भी बीजिंग के ऊपर दबाव डाला कि वह भारत के साथ विवाद जल्द से जल्द सुलझाए। इसके पूर्व जब शंघाई सहयोग संगठन की बैठक हुई थी, तो उस समय डोकलाम विवाद प्रारंभिक स्टेज में था। परंतु अब इस मामले को नहीं सुलझाने पर ब्रिक्स सम्मेलन ही संकट के दायरे में आ जाता। माना जा रहा है कि ब्रिक्स सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री ने भाग लेने के लिए शर्त ही रख दी थी कि पहले चीन डोकलाम मुद्दे को मुद्दे को सुलझाए। इस कारण ब्रिक्स के सम्मेलन को सफल बनाने के लिए चीन के लिए यह आवश्यक हो गया था।

इस बीच चीनी धमकियों को जवाब देने के लिए भारतीय सेना ने सीमा पर युद्ध की तैयारी पूरी कर ली थी। सीमा पर भारतीय सेन की पूरी तैयारी ने युद्ध की बात करके डरा रहे चीन पर ही उल्टा दबाव बना दिया। डोकलाम मामले को गर्म कर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग चीन की आंतरिक कमजोरियों को छुपाकर नवंबर में कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में फिर से अगले कालावधि का राष्ट्रपति पद पाना चाहते हैं। एक तरह से शी चिनफिंग डोकलाम मामले का लाभ लेकर कम्युनिस्ट पार्टी में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते थे, परंतु भारतीय सेना के अटल इरादों ने शी जिनपिंग की उपरोक्त योजना को ध्वस्त कर दिया था। इस मामले के और लंबा खिंचने पर चीन की घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय छवि को और नुकसान ही पहुंचना था।

चीन बार-बार युद्ध की धमकी दे रहा था। परंतु डोकलाम में भारत को महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त हासिल है। सामरिक मजबूत स्थिति के कारण डोकलाम में भारतीय पक्ष, चीनी पक्ष से कम से कम 9 गुणा मजबूत है। अर्थात् भारत के एक सैनिक के समतुल्य चीन को 9 सैनिक खड़े करने होंगे। ऐसी स्थिति में डोकलाम में भारत को हिला पाना चीन के लिए कठिन होगा।

भारत और चीन की भौगोलिक स्थिति भी भारत के पक्ष में है। जंग होने पर चीनी विमानों को तिब्बत के पठार से से उड़ान भरनी होती। ऐसे में न तो चीनी विमानों में ज्यादा विस्फोटक लादे जा सकते हैं और न ही ज्यादा ईंधन भरे जा सकते हैं। चीनी वायुसेना विमानों में हवा में ईंधन भरने में भी उतनी सक्षम नहीं है। युद्ध की स्थिति में चीन के जे-11 और जे-10 विमान चोंग डू सैन्य क्षेत्र से उड़ान भरते। वहीं भारत ने असम के तेजपुर में सुखोई 30 का ठोस बेस बनाया है। युद्ध की स्थिति में विमान यहां से तेजी से उड़ान भर सकेंगे।

आज उत्तर पूर्व में हमारी तीन सैन्य कोर यानी तीन लाख जवान तैनात हैं। इस क्षेत्र में कभी कंपनियां हुआ करती थीं, लेकिन आज वहां ब्रिगेड तैनात है। ज्ञात हो एक कंपनी में 100 जवान होते हैं, जबकि ब्रिगेड में 3000 हजार जवान होते हैं। इससे पूर्वोतर में सामान्य स्थिति में भी भारत की भारी भरकम सैन्य उपस्थिति को समझा जा सकता है। अगर वहां थोड़ी भी सैन्य संघर्ष की स्थिति आती है तो चीन को भारत, डोकलाम से निर्णायक दूरी तक पीछे कर देगा।

तुलनात्मक तौर पर भारत चीन के समक्ष भले ही कमजोर लगता है, परंतु वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। चीनी सेना ने वियतनाम युद्ध के बाद किसी युद्ध में भाग नहीं लिया है जबकि भारतीय सेना सदैव पाकिस्तानी सीमा पर अघोषित युद्ध से संघर्षरत ही रहती है। विशेषकर हिमालयी सरहदों में चीन की इतनी काबिलियत नहीं है वह भारत का मुकाबला कर सके।

चीन अपने विशिष्ट दबाव की रणनीति के अंतर्गत अपने विस्तारवादी वर्चस्व को आगे बढ़ाता रहा है। इसके सबसे ज्वलंत उदाहरण के रूप में दक्षिण चीन सागर को देखा जा सकता है। पिछले 3 वर्षों में चीन ने बिना एक भी गोली चलाए, दक्षिण चीन सागर के लगभग दो तिहाई भाग पर कब्जा कर लिया है। इसी तरह चीन ने भारत पर भी दबाव डालने का भरपूर प्रयास किया। चीनी मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ के माध्यम से भारत को लगातार धमकी दी गई, जब इसका भी प्रभाव नहीं पड़ा तो चीनी विदेश मंत्रालय ने भी कमान संभाल ली। धमकियों को कई बार व्यापक रूप प्रदान करने के लिए संपूर्ण चीनी सीमा पर युद्ध की धमकी दी गई, लेकिन भारत द्वारा डोकलाम में सुदृढ़ तरीके से खड़े रहने से अंतत: चीनी मनोबल ही टूटता चला गया।

इस समय चीन न केवल डोकलाम पर अपितु दक्षिण चीन सागर में भी बुरी तरह से घिरा हुआ है। साथ ही चीन के आक्रामक विस्तारवादी रवैये से उसके अधिकांश पड़ोसी देशों के साथ भी संबंध खराब हैं। साथ ही न केवल संपूर्ण पश्चिमी देशों अपितु संपूर्ण पश्चिमी मीडिया का भी भारत को पूर्ण समर्थन रहा। चीन ने इस संपूर्ण प्रकरण में कई बार भूटान और नेपाल जैसे छोटे पड़ोसी देशों को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया, लेकिन यह प्रयास भी विफल रहा। चीनी विदेश मंत्रालय ने तो एक बार भूटान के हवाले से बयान जारी कर दिया कि भूटान ने ही मान लिया है कि डोकलाम, भूटान का हिस्सा नहीं है। परंतु भूटान ने बाद में स्पष्ट कर दिया कि उसने इस तरह का कोई बयान नहीं दिया है। इसी तरह इस संपूर्ण मामले में नेपाल ने तटस्थ रहने की नीति अपनाई। अभी ही 5 दिवसीय भारत यात्रा पर आए नेपाली प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने भारत में स्पष्ट घोषणा कर दी कि वे अपनी जमीन का प्रयोग का प्रयोग किसी भी तरह से भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं करने देंगे। जापान ने तो डोकलाम मामले को लेकर भारत को स्पष्ट समर्थन की घोषणा ही कर दी थी।

इसके अतिरिक्त भारत की स्थिति हिंद महासागर में काफी मजबूत है। भारतीय नौसेना बड़ी आसानी से यूरोप, मध्यपूर्व और अफ्रीका के साथ चीन के रास्ते की नाकेबंदी कर सकती है। चीन 87% कच्चा तेल इसी रास्ते आयात करता है। आईएनएस विक्रमादित्य की अगुवाई में भारतीय नौसेना इस नाकेबंदी को और मजबूत कर सकती है।

भारत से 5 अरब डॉलर का कारोबार करने वाला चीन इतने बड़े बाजार को भी जोखिम में नहीं डाल सकता था। भले ही तनाव के मध्य चीनी विदेश मंत्रालय ने अपनी कंपनियों को भारत में निवेश न करने की सलाह दी हो, परंतु वास्तविक स्थिति बिल्कुल भिन्न है। चीन ने पिछले वर्षों में जितना निवेश किया है, उसका 77% निवेश हाल के कुछ वर्षों में हुआ है। सरकार ने कुछ ऐसी नीतियां बनाई हैं, जिससे चीन भारत में निवेश बढ़ाने के लिए मजबूर हुआ। सरकार ने मोबाइल कंपोनेंट पर 30% तथा तैयार मोबाइल पर 10 फीसदी आयात शुल्क लगा दिया है। इससे आयात महंगा होने के कारण चीनी कंपनियां भारत में ही यूनिट लगा रही हैं। ज्ञात हो चीनी मोबाइल कंपनियों का 50% बाजार भारतीय बाजार ही है। इस विवाद के बाद भारत में चीन विरोधी भावनाएँ बढ़ती जा रही थीं तथा उनका मार्केट शेयर भी गिरता जा रहा था। भारत-चीन व्यापार पूर्णतः चीन के पक्ष में झुका हुआ है। यही कारण है कि इस भारी तनाव के बीच नाथूला से चीन ने भारत के मानसरोवर तीर्थयात्रियों का रास्ता तो बंद किया था, लेकिन व्यापार नहीं।

इस संपूर्ण प्रकरण से चीन की अंतर्राष्ट्रीय छवि विश्व समुदाय में जहां धूमिल हुई, वहीं भारत के दृढ़ता ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत, चीन के दुष्प्रचार और झांसे में न तो आता है और न आएगा। साथ ही दक्षिण एशिया में चीन को प्रतिसंतुलित करने वाले घटक के रूप में भारत की छवि में निखार ही आया है। इस मामले में भारत पीछे जाता तो न केवल पूर्वोतर भारत गंभीर सुरक्षा संकट से जूझता, अपितु दक्षिण एशिया विशेषकर पड़ोसी देशों में भारत की छवि धूमिल होती। परंतु इस घटनाक्रम के तहत चीन को भारत ने सम्मानित ढंग से बाहर जाने का मौका देकर एक संतुलित रास्ते की ओर कदम बढ़ाया है। साथ ही भारत को सदैव चीन के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता है।

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