क्या जरूरी है ईश्वर की हर वक्त स्तुति?

-ऐसा क्यूं

स महंगाई के युग में गरीब व आम आदमी हर पल संघर्ष कर रहा है। अपने घर-परिवार के लिए रोजी-रोटी जुटाना मुहाल हो रहा है। परेशान हाल व्यक्ति कभी ईश्वर को याद करता है तो कभी वह परेशानियों की चिंता में डूब जाता है। सरकार व समाज के लोग भी गरीब की कोई सुनवाई नहीं कर रहे हैं। ऐसे में ईश्वरवादी लोग गरीब को ईश्वर की हर वक्त पूजा-पाठ करने, मंत्रों का उच्चारण करने आदि की सलाह भी देते हैं। ईश्वरवादियों का तर्क होता है कि दुख तभी दूर होगा जब ईश्वर चाहेंगे, ऐसे में उनकी हर वक्त पूजा-अर्चना जरूरी है। अब गरीब आदमी के सामने संकट होता है कि वह पूजा-अर्चना में जुट जाए या फिर दो वक्त की रोटी जुटाने में अपना समय लगाए। वैसे भी कहा गया है कि भूखे भजन नहीं होत गोपाला। ऐसे में भूखा व्यक्ति पूजा-अर्चना में हर वक्त अपना मन कैसे लगा सकता है। सवाल वाजिब है।
भगवत गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्मयोगी बनने के लिए निष्काम कर्म जरूरी है। फल की इच्छा न रखकर मन को परमात्मा में स्थिर रखते हुए कर्म करते रहना चाहिए। वह अर्जुन को सन्यासी बनकर युद्ध भूमि को छोड़ने से मना करते हैं, बल्कि वह कहते हैं बिना विजय व हार की लालसा के अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। ऐसे में आम आदमी को भी अपने परिवार के पालन-पोषण व उसके बाद लोक कल्याण के लिए निष्काम भाव से निरंतर काम करते रहना चाहिए। फल की इच्छा ईश्वर पर छोड़ देनी चाहिए, उसे फल अवश्य प्राप्त होगा। हर वक्त पूजा-अर्चना में लगकर खुद को परिवार व समाज से दूर करना सन्यासी बनना है। कर्मयोग में इस पर मनाही करते हुए कर्तव्य पालन पर जोर दिया गया है। परिवार का पालन-पोषण कर्तव्य पालन का ही हिस्सा है। यह पालनहार ईश्वर के कार्य में शामिल होना है।

-रमेश चन्द्र

(लेखक एलायंस टुडे के संपादक हैं)

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