ऐसा क्यूं?

ज हमारे देश में विभिन्न वर्गों के बीच मानसिक स्तर पर संघर्ष क्यों चल रहा है? कभी धर्म के नाम पर, कभी जाति के नाम पर, कभी क्षेत्र के नाम पर, हमारा भारतीय समाज या कहें भारत में रह रहे मानव आपस में ही लड़ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि ये लड़ाई कुछ समय की देन है बल्कि ये तो हजारों वर्षों से चला आ रहा है। इस भेदभावपूर्ण लड़ाई को खत्म करने के लिए हमारे देश में बड़े-बड़े महापुरुषों ने जन्म लिया और इस भेद को समाप्त करने का भरसक प्रयत्न किया। दुर्भाग्य की स्थिति यह है कि इस हाइटेक युग में भी हम वहीं पर हैं जहां हजारों साल पहले थे। वर्तमान में भारतीय राजनीति में उन्हीं समाज विरोधी तत्वों का सहारा लिया जा रहा है। देश में हो रहे चुनावों में धर्म, जाति व क्षेत्र फैक्टर हावी हैं। राजनीतिक दल इन्हीं के सहारे सत्तासीन हो रहे हैं और देश की आम जनता को ठगने का काम कर रहे हैं। अगर हम उत्तर प्रदेश पर नजर डालें तो यहां धर्म व जाति फैक्टर चुनावों में ज्यादा हावी हो जाता है। आम जनता राजनेताओं की इन चालाकियों को समझती तो है पर वह उनका शिकार बनने से नहीं रह पाती है। ऐसा कब तक चलता रहेगा? अब हम इन दो भेदों (धर्म व जाति) का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि विभिन्न धर्मों में जाति का कहीं कोई स्थान नहीं है। हिन्दू धर्म में विभिन्न जातियों के लोग हैं पर हिन्दू धर्म के शास्त्रों में कहीं भी जाति का उल्लेख नहीं हैं। केवल चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, व शूद्र) का उल्लेख है। ये वर्ण हैं। जाति नहीं हैं। वेद व गीता में भी कर्म व गुणों के आधार पर वर्ण होने की बात कही गई है न कि जन्म से। हिन्दू धर्म के दुष्ट धर्माधिकारियों ने अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए अपने स्तर पर जाति व्यवस्था चला रखी है और इसी जाति व्यवस्था के तहत लोगों में भेदभाव का जहर घोला गया है। बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने इसी भेदभाव को खत्म करने के लिए हिन्दू धर्म के दुष्ट लोगों के खिलाफ आन्दोलन छेड़ा था। इस आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए कोई राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन कारगर प्रयास नहीं कर रहा है। बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के नाम पर राजनीतिक दल केवल सत्तासुख भोगने का काम करते रहे हैं। आखिर ये सब कब तक चलता रहेगा?

रमेश चन्द्र 

Share on
Loading Likes...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *